अयोध्या के श्री राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का मामला अब सिर्फ एक आपराधिक जांच नहीं रह गया है। यह देश के सबसे प्रतिष्ठित धार्मिक स्थलों में से एक की प्रशासनिक व्यवस्था, निगरानी तंत्र और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। हज़ारों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस मंदिर में दान-पुण्य की व्यवस्था को लेकर उठे सवाल राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर भी बहस का विषय बन गए हैं।
बीबीसी ने इस मामले की गहन पड़ताल की। दो ऐसे लोगों से बात की गई जिन्होंने राम मंदिर में काम करते हुए दान और चढ़ावे की व्यवस्था को बेहद नज़दीक से देखा है। उनके बयान, एसआईटी की शुरुआती जांच के निष्कर्ष और राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े लोगों के दावों को एक साथ रखने पर पूरा मामला काफ़ी उलझा हुआ नज़र आता है।

साल 2021 और 2022 के दौरान महिपाल सिंह राम मंदिर में काम करते थे और वहां का हिसाब-किताब देखते थे
‘प्रभु का धन है, प्रभु देख रहे हैं’
पहली बातचीत एक पूर्व काउंटिंग कर्मचारी से हुई। उन्होंने पहचान न ज़ाहिर करने की शर्त पर बीबीसी से बात की। उन्होंने बताया कि श्रद्धालु दानपात्रों में जो नकद चढ़ावा डालते थे, उसे काउंटिंग रूम में लाया जाता था। वहां नोटों की छंटाई होती थी, फिर बैंक की काउंटिंग मशीन से गिनती करके पैसा बैंक भेज दिया जाता था।
क्या उन्होंने या उनके साथियों ने चोरी होते हुए देखा? उन्होंने कहा, “हमने खुद नहीं देखा, लेकिन कभी-कभी ऐसा महसूस हुआ कि कुछ गड़बड़ हो रही है। हमारे साथ काम करने वाले लोगों ने चोरी करने वालों को पकड़ा। कई बार शिकायत भी हुई और कहा गया कि सिक्योरिटी बढ़ाई जाए। जो इंचार्ज थे—सुभाष श्रीवास्तव जी—उनसे शिकायत की गई। उन्होंने कहा कि ये प्रभु का धन है, प्रभु देख ही रहे हैं। इसमें हम और आप क्या कर सकते हैं? कौन सा हमारे-आपके घर से जा रहा है?”
एसआईटी की शुरुआती जांच में सुभाष श्रीवास्तव को मंदिर का गणना प्रभारी बताया गया है। वे उन आठ लोगों में शामिल हैं जिन्हें 26 जून को उत्तर प्रदेश पुलिस ने गिरफ्तार किया। गिरफ्तार आठों के वकील कुलशेखर सिंह का कहना है कि सुभाष श्रीवास्तव के मुताबिक वे काउंटिंग रूम के इंचार्ज नहीं थे और उस कमरे में मौजूद नहीं रहते थे जहां नोटों-सिक्कों की छंटाई होती थी। उनका दावा है कि वे सिर्फ उस कमरे में रहते थे जहां बैंक कर्मचारियों की मौजूदगी में पैसे की गिनती होती थी।

आशीष अग्निहोत्री चंपत राय के क़रीबी माने जाते हैं
पूर्व कर्मचारी ने बताया कि उन्हें पहली बार चोरी की जानकारी साथियों से मिली। कुछ सहकर्मियों ने बताया कि काउंटिंग के दौरान पैसे गायब किए जा रहे हैं। इसके बाद कुछ लोगों ने नज़र रखनी शुरू की। उनके मुताबिक कुछ कर्मचारी नोटों को जूतों, जैकेटों या कपड़ों के अंदर छिपाकर बाहर ले जाते थे। काउंटिंग रूम के कुछ ज़िम्मेदार लोग चोरियों को रोकने के प्रति गंभीर नहीं थे, जिससे अभियुक्तों को कोई खास डर नहीं था।
2022 में भी उठे थे गड़बड़ी के आरोप
चढ़ावा चोरी का मौजूदा विवाद नया नहीं है। 2021 और 2022 के दौरान महिपाल सिंह राम मंदिर में हिसाब-किताब देखते थे। उनका दावा है कि 2022 में उन्होंने पांच लाख रुपये की गड़बड़ी पकड़ी थी।
महिपाल सिंह बताते हैं कि वे गिनती की निगरानी कर रहे थे। दिनभर की गिनती से उन्हें अनुमान था कि बड़ी राशि जमा हुई है, लेकिन शाम को जो आधिकारिक आंकड़ा बताया गया, वह कम लगा। उन्होंने कहा, “सीसीटीवी लगे हुए थे, नीचे तख्ते लगे हुए थे जिन पर सारा पैसा फैला दिया जाता था। पहले सॉर्टिंग होती थी, फिर बैंक वालों को देते थे। एक बार मैंने बड़े नोटों पर ध्यान दिया कि आज लगभग इतनी राशि होनी चाहिए। शाम को जो बताया, वह मेरे समझ में नहीं आया। मैंने कहा बक्सा खोलकर दिखाइए। जब खोला तो वाउचर और ले जाई जा रही राशि में पांच लाख रुपये का अंतर था।”
उनके मुताबिक अगर बक्सा दोबारा नहीं खुलवाया जाता तो अतिरिक्त राशि का कोई रिकॉर्ड नहीं बनता। उन्होंने उसी दिन तत्कालीन वरिष्ठ पदाधिकारियों—गोपाल राव, अनिल मिश्रा और चंपत राय—को जानकारी दी। उनका आरोप है कि कार्रवाई की बजाय कुछ सीसीटीवी फुटेज हटाने की कोशिश हुई और अगले दिन से उन्हें वहां से हटा दिया गया।
गोपाल राव (पूर्व विशेष आमंत्रित सदस्य) ने बीबीसी से कहा कि महिपाल सिंह के आरोप गलत हैं और सच एसआईटी जांच के बाद सामने आएगा। अनिल मिश्रा की तरफ से कोई जवाब नहीं आया। महिपाल सिंह के दावों की स्वतंत्र पुष्टि बीबीसी नहीं कर सका।
टाइमलाइन: शक से गिरफ्तारी तक

चढ़ावा चोरी का मामला सार्वजनिक होने के बाद चंपत राय ने राम मंदिर ट्रस्ट से इस्तीफ़ा दे दिया
ट्रस्ट से जुड़े लोगों के अनुसार 3 से 5 जून के बीच पहली बार चोरी की बात सामने आई। 7 जून को समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर करोड़ों की रकम गायब होने का दावा किया। 8 जून को तत्कालीन महासचिव चंपत राय ने वीडियो जारी कर कहा कि ऑडिट चल रहा है और कोई उल्लेखनीय बात सामने नहीं आई।
12 जून को ट्रस्ट ने एसआईटी बनाने की मांग की। 13 जून को राज्य सरकार ने एसआईटी गठित कर दी। 25 जून को एफआईआर दर्ज हुई जिसमें आठ लोगों को नामज़द किया गया और अगले दिन उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। एसआईटी बनने और उसके 12 दिन बाद तक भी एफआईआर दर्ज नहीं हुई थी। सबसे बड़ा सवाल यही है—जब शक हो चुका था तो एफआईआर में इतनी देरी क्यों?

एसआईटी जांच में यह भी कहा गया है कि साल 2024 में बने सुरक्षा नियमों को 2025 में कमज़ोर कर दिया गया
आशीष अग्निहोत्री (वर्तमान भोजन भोग प्रभारी और चंपत राय के करीबी) ने माना कि 4 जून को ही ट्रस्ट ने कुछ अभियुक्तों को सीसीटीवी पर संदिग्ध हरकतें करते देखा और 5 जून से आंतरिक जांच शुरू की। उन्होंने कहा, “काम करते-करते नज़र वहां गई। कैमरे और काउंटिंग की समीक्षा हो रही थी। गड़बड़ी लगी तो सर्विलांस लगाया, गुप्त कैमरे लगाए।”
शंका कैसे हुई? “वे कैमरे के सामने एक निश्चित समय पर खड़े हो रहे थे… ऐसा क्यों?” लेकिन शक के बावजूद तुरंत एफआईआर क्यों नहीं? आशीष अग्निहोत्री का जवाब—पहले दिन ही अगर एफआईआर करनी होती तो कर देते। शंका हुई तभी एसआईटी के पास गए। छिपाने का कोई प्रयास नहीं किया।
ट्रस्ट से जुड़े कई लोगों ने माना कि शुरुआती दिनों में ही ट्रस्ट ने अभियुक्तों से बड़ी मात्रा में चोरी का पैसा बरामद करना शुरू कर दिया था। एसआईटी की शुरुआती रिपोर्ट ने भी इसकी पुष्टि की—एसआईटी बनने से पहले ही ट्रस्ट करीब 81 लाख रुपये बरामद कर चुका था। अभियुक्त पहचाने जा चुके थे, पैसा बरामद हो रहा था, फिर भी कई दिनों तक पुलिस में शिकायत क्यों नहीं की गई?
चंपत राय और नए सवाल
महिपाल सिंह का दावा है कि 5 जून को वे अयोध्या पहुंचे और चंपत राय से मिले। चंपत राय ने कथित तौर पर कहा, “तुम्हारा विषय सही था और उसी सिलसिले में मुझे अभी जाना है।” महिपाल सिंह के मुताबिक इसका मतलब था कि चार साल पहले की पांच लाख रुपये की गड़बड़ी सही थी।
मामला सार्वजनिक होने के बाद चंपत राय ने ट्रस्ट से इस्तीफा दे दिया। 7 जुलाई को उन्होंने लिखा कि एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट आने के बाद सभी सवालों का जवाब देंगे। बीबीसी के संदेशों और फोन पर कोई जवाब नहीं आया।
महिपाल सिंह ने यह भी दावा किया कि सार्वजनिक रूप से बोलने के बाद उन पर दबाव पड़ रहा है। 1968 से आरएसएस से जुड़े रहने के बावजूद उन्हें संगठनात्मक गतिविधियों से दूर कर दिया गया। आरएसएस ने सीधे जवाब नहीं दिया, जबकि संगठन के करीबी लोगों ने आरोपों को निराधार बताया।
राजनीतिक गहमागहमी
कांग्रेस नेता शरद शुक्ला ने कहा, “किसी छोटे मंदिर में घंटा चोरी हो जाए तो पुजारी तुरंत एफआईआर करता है। यहां इतनी बड़ी चोरी हुई फिर भी 12-13 दिन बीत गए। इतनी लंबी चोरी बिना जानकारी और संरक्षण के असंभव है।”
फैजाबाद सांसद अवधेश प्रसाद (समाजवादी पार्टी) ने कहा, “सारी ज़िम्मेदारी भाजपा की है। ट्रस्ट भाजपा ने बनाया है, नृपेंद्र मिश्रा जैसे लोग नज़दीक हैं। चोरी नहीं डकैती है।”
अयोध्या महापौर गिरीश पति त्रिपाठी (भाजपा) ने जवाब दिया, “ट्रस्ट में कुछ विसंगतियां आईं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रभावी कार्रवाई कर रहे हैं। भाजपा अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे नहीं हट रही। दूध का दूध, पानी का पानी होगा। इस घटना से सबक लेकर व्यवस्थाओं को और प्रभावी बनाया जाएगा।”
एसआईटी की शुरुआती जांच में क्या सामने आया?
गिरफ्तार आठ में से छह काउंटिंग रूम में काम करते थे। बाकी दो—सुभाष श्रीवास्तव और राम शंकर यादव उर्फ़ टिन्नू (पूर्व में चंपत राय के ड्राइवर, बाद में करीबी सहयोगी)। एसआईटी के मुताबिक नियमित तलाशी न होने से चोरी संभव हुई, जिसके लिए सुभाष श्रीवास्तव ज़िम्मेदार हैं। टिन्नू पर आरोप है कि वे बिना औपचारिक अधिकार के हुंडियों की चाबियां रखते थे और उनकी सिफारिश पर रिश्तेदार मनीष कुमार यादव को नौकरी मिली।
वकील कुलशेखर सिंह का कहना है कि अभियुक्तों पर आदतन अपराधी की धारा सिर्फ ज़मानत रोकने के लिए लगाई गई है। टिन्नू को फंसाया जा रहा है। अगर एफआईआर से पहले ही संपत्ति ट्रस्ट को वापस मिल गई तो वह चोरी का सामान नहीं रह जाता।
एसआईटी ने कहा कि 2024 के सुरक्षा नियमों को 2025 में कमजोर कर दिया गया और नियमित तलाशी बंद हो गई। इसके लिए पूर्व ट्रस्टी अनिल मिश्रा को भी ज़िम्मेदार ठहराया गया। उन्होंने नियमों को लागू नहीं करवाया और शिकायत पर कार्रवाई नहीं की। मामला सामने आने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
सुरक्षा का ज़िम्मा प्राइवेट कंपनी एसआईएस के पास था। कंपनी के एक अधिकारी (पहचान गोपनीय) ने कहा कि उनकी ज़िम्मेदारी सिर्फ भीड़ नियंत्रण की थी, काउंटिंग रूम से बाहर आने वालों की तलाशी का काम नहीं दिया गया था। अब यह ज़िम्मेदारी भी उन्हें दी गई है।
एसआईटी सिर्फ 27 अप्रैल से 5 जून के बीच की सीसीटीवी फुटेज जांच सकी। इन 39 दिनों में 70 बार चोरी होती दिखाई दी—कर्मचारी नोटों की गड्डियां और खुले नोट कपड़ों, जेबों और जूतों में छिपाते नजर आए। अभियुक्तों के बयान और बैंक खातों से लगता है कि चोरी पहले भी हो रही थी, लेकिन पुरानी फुटेज उपलब्ध न होने से सटीक आंकड़ा नहीं पता चल सका।
अब आगे क्या?
13 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी से रिपोर्ट मांगी। 19 जुलाई को स्टेटस रिपोर्ट सौंपी गई। 20 जुलाई को अदालत ने सुझाव दिया कि निष्पक्ष जांच के लिए मजबूत एसआईटी बनाई जाए या मौजूदा का पुनर्गठन हो। इसके बाद सरकार ने एसआईटी का पुनर्गठन कर दिया। 27 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्गठित एसआईटी में स्वतंत्र फॉरेंसिक ऑडिटर शामिल करने का निर्देश दिया।
जांच जारी है। सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं कि कितनी रकम चोरी हुई। असल सवाल यह है कि लाखों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े मंदिर की निगरानी व्यवस्था में चूक कैसे हुई, और क्या जांच उन सभी ज़िम्मेदार लोगों तक पहुंचेगी जिन पर लापरवाही और मिलीभगत के आरोप लग रहे हैं?
रिपोर्ट :सुरेंद्र कुमार

