अहमदाबाद: गुजरात उच्च न्यायालय ने रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) के 29 कर्मियों (25 हेड कांस्टेबल और 4 कांस्टेबल) को बड़ी राहत देते हुए उनके विलंबित स्थानांतरण आदेशों पर रोक लगा दी है। अदालत ने आरपीएफ प्रशासन को सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि उच्च पदाधिकारियों से अनुशासन की अपेक्षा की जाती है, लेकिन उन्हें स्वयं अपने दिशानिर्देशों और कानून के शासन का पालन करना चाहिए।
याचिका का आधार

पश्चिम रेलवे के अंतर्गत कार्यरत इन कर्मियों ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दायर कर आरपीएफ के स्थानांतरण आदेशों को चुनौती दी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि 9 जून 2026 और 10 जून 2026 को जारी स्थानांतरण आदेश आरपीएफ की अपनी नीति निर्देश संख्या 58 का स्पष्ट उल्लंघन हैं। यह निर्देश आरपीएफ नियम 1987 के नियम 92 और 93 के तहत जारी किया गया था।
मुख्य शिकायतें:
- समय-सीमा का उल्लंघन: नीति के अनुसार वार्षिक स्थानांतरण प्रक्रिया जनवरी में शुरू होकर 31 मार्च तक पूरी होनी चाहिए। लेकिन आदेश जून में जारी किए गए, जब नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका था।
- विकल्प चयन की अनदेखी: निर्देश के खंड C(xvi) के तहत कर्मचारियों को तीन विकल्प देने थे, लेकिन इसे नजरअंदाज किया गया।
- मानवीय छूटों की अवहेलना: कामकाजी पति/पत्नी, गंभीर बीमारी वाले कर्मी या बच्चों की शिक्षा (9वीं-11वीं) से जुड़ी छूटों पर ध्यान नहीं दिया गया।
- अत्यंत कम समय: कर्मियों को मात्र 5 दिनों में रिपोर्ट करने को कहा गया, जबकि नीति में उचित समय की व्यवस्था है।
- पूर्व सैनिकों के साथ अन्याय: याचिकाकर्ता गौरव परमार समेत पूर्व सैनिकों को होम जोन/डिवीजन में प्राथमिकता देने का प्रावधान भी नजरअंदाज किया गया।
अदालत में महत्वपूर्ण मोड़
न्यायमूर्ति निरल आर. मेहता के समक्ष सुनवाई के दौरान आरपीएफ के वकील ने ट्रांसफर मैनेजमेंट सिस्टम (TMS) में तकनीकी खराबी स्वीकार की। जिन कर्मियों ने रतलाम या बड़ौदा मंडल चुना था, उन्हें गलती से मुंबई मंडल में भेज दिया गया।
अदालत ने इस पर कड़ी टिप्पणी की और पूछा कि जब प्रशासन खुद गलती मान चुका है, तो कर्मियों को गलत जगह क्यों मजबूर किया जाए? अदालत ने स्थानांतरण आदेशों के क्रियान्वयन पर तत्काल रोक लगाने के निर्देश दिए।
कोर्ट के निर्देश
- याचिकाकर्ता अपनी पसंद, सिस्टम त्रुटि और पारिवारिक कठिनाइयों का उल्लेख करते हुए अभ्यावेदन दें।
- अभ्यावेदनों पर पूरा निर्णय होने तक किसी कर्मी को कार्यमुक्त नहीं किया जाएगा।
- अनुपालन न करने पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी।
जनहित में मायने
यह मामला केवल 29 कर्मियों तक सीमित नहीं है। यह आरपीएफ जैसी अर्ध-सैनिक बल की आंतरिक नीतियों के पालन, पारिवारिक स्थिरता और कर्मचारी कल्याण को लेकर महत्वपूर्ण संदेश देता है। उड़ीसा हाईकोर्ट के एक समान फैसले का हवाला देते हुए याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ अधिवक्ता आई.एच. सैयद ने जोर दिया कि प्रशासन को खुद कानून का पालन करना चाहिए।
आरपीएफ ने अभी तक आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन अदालत के अंतरिम आदेश से हजारों आरपीएफ परिवारों को राहत मिलने की उम्मीद है, जिन्हें अक्सर अचानक स्थानांतरणों से परेशानी का सामना करना पड़ता है।
याचिका में मांगी गई मुख्य राहतें:
- 9 और 10 जून 2026 के स्थानांतरण आदेश रद्द किए जाएं।
- अंतिम फैसला होने तक पूर्ण स्थगन।
- किसी भी प्रकार की प्रतिकूल कार्रवाई पर रोक।
यह फैसला प्रशासनिक अनुपालन और कर्मचारी कल्याण के बीच संतुलन बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। मामले की अगली सुनवाई का इंतजार है।
रिपोर्ट :सुरेंद्र कुमार

