“कैलकुलेशन, कास्ट और कैश” के जाल में फंसी रेलवे की स्थानांतरण नीति

रेलवे बोर्ड के विरोधाभासी आदेशों से उजागर हुई वित्तीय विंग में अनियमितताएं ईमानदार महिला अधिकारी की ‘सजा’ और भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे अधिकारी को संरक्षण?

डीडी भारती | 8 जून 2026

नई दिल्ली। भारतीय रेलवे के वित्तीय प्रशासन में एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। अप्रैल-जून 2026 के बीच जारी दो स्थानांतरण आदेशों की क्रोनोलॉजी, शीर्ष नेतृत्व की भूमिका और व्हिसलब्लोअर इनपुट्स से ऐसा चित्र उभर कर सामने आया है जिसमें नीतिगत विरोधाभास, संस्थागत पूर्वाग्रह और ‘कास्ट-कैश’ की आशंकाओं का मिश्रण दिखाई दे रहा है।

क्रोनोलॉजी: अप्रैल से जून तक का ‘संगठित’ खेल?

24 अप्रैल 2026 को रेलवे बोर्ड ने आदेश संख्या E(O)III-2026/TR/166 जारी कर पूर्वोत्तर रेलवे (NER) के तत्कालीन PFA अमरजीत गौतम (HAG/IRAS) को दिल्ली (उत्तर रेलवे) में PFA (Construction) पद पर स्थानांतरित कर दिया।

आश्चर्यजनक बात यह रही कि इतने महत्वपूर्ण वित्तीय पद को रेलवे बोर्ड ने एक महीने से अधिक समय तक रिक्त रखा। फिर 3 जून 2026 को आदेश संख्या E(O)III-2026/PM/53 के तहत पूर्व मध्य रेलवे (ECR) की PFA (Construction) — एक ईमानदार महिला अधिकारी — को असमय हटाकर गोरखपुर (NER) भेज दिया गया।

प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह समय-अंतराल सामान्य प्रक्रिया नहीं, बल्कि पूर्व-नियोजित रणनीति प्रतीत होता है।

‘पारिवारिक कारणों’ का दुरुपयोग और 20 वर्ष का एकाधिकार

रिपोर्ट के अनुसार, ECR के वर्तमान नियमित PFA पिछले 20-22 वर्षों से विभिन्न प्रशासनिक जुगाड़ों और ‘पारिवारिक कारणों’ का हवाला देकर इसी जोन में बने हुए हैं। केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) के कंपलसरी रोटेशन के सिद्धांत की इस अवहेलना पर सवाल उठ रहे हैं।

व्हिसलब्लोअर के अनुसार, यह अधिकारी गंभीर वित्तीय अनियमितताओं, बोगस बिलों और भ्रष्टाचार के आरोपों के घेरे में हैं, फिर भी उन्हें शीर्ष स्तर पर संरक्षण प्राप्त है।

27 मई की ‘रहस्यमयी’ बैठक

सबसे गंभीर खुलासा यह है कि 27 मई 2026 को ECR के विवादित PFA की रेलवे बोर्ड के Member Finance (MF) के साथ उच्च स्तरीय बैठक हुई। ठीक इसके बाद 3 जून को ईमानदार महिला अधिकारी का स्थानांतरण आदेश जारी कर दिया गया।

क्या यह महज संयोग था? या लॉबिंग का परिणाम?

ईमानदारी की सजा बनाम भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन

महिला अधिकारी ने ECR के निर्माण संगठन में आते ही बोगस बिलों और दीर्घकालिक अनियमितताओं के खिलाफ ठोस कार्रवाई शुरू की थी। लेकिन जैसे ही सुधार की दिशा दिखने लगी, उन्हें गोरखपुर स्थानांतरित कर दिया गया।

दूसरी ओर, आरोपों में घिरे अधिकारी को सेवानिवृत्ति के अंतिम 8 महीनों तक आराम से रहने का ‘कवच’ मिलता दिख रहा है।

अनुत्तरित प्रश्न जो रेलवे बोर्ड को घेर रहे हैं:

  1. यदि NER में PFA की इतनी तत्परता थी तो 20 वर्ष से एक ही जगह जमे ECR के PFA को ही क्यों नहीं भेजा गया?
  2. ईमानदार महिला अधिकारी को ECR का नियमित PFA क्यों नहीं बनाया गया?
  3. Member Finance के साथ 27 मई की बैठक का क्या एजेंडा था?
  4. CVC के रोटेशन नियमों को रेलवे बोर्ड क्यों लगातार नजरअंदाज कर रहा है?

शुचिता का संकट

यह प्रकरण रेलवे के शीर्ष प्रशासन में नैतिक पतन, पक्षपात और पारदर्शिता की कमी का जीवंत उदाहरण बन गया है। यदि ईमानदार अधिकारियों को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की ‘सजा’ मिलती रही और कदाचारी अधिकारियों को संरक्षण, तो रेलवे की वित्तीय व्यवस्था और आंतरिक सुशासन दोनों गंभीर खतरे में पड़ जाएंगे।

रेलवे बोर्ड को इस पूरे मामले पर तत्काल स्पष्टीकरण देना चाहिए और पारदर्शी जांच सुनिश्चित करनी चाहिए, ताकि रेल कर्मचारियों और जनता का विश्वास बहाल हो सके।

रेलवे प्रशासन की नीयत और नीति दोनों पर सवालिया निशान लग चुका है। जवाबदेही का समय अब आ गया है।

रिपोर्ट :सुरेंद्र कुमार

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!