
ऐ जननी ! बड़ा ही सुकून पाता हूँ मैं , तेरी गोद में ,
बड़ा ही भाव – विभोर हो जाता हूँ मैं , तेरी गोद में ।
पल में दु:खद अतीत भूल जाता हूँ मैं , तेरी गोद में ,
भविष्य के सुनहरे सपने सजाता हूँ मैं , तेरी गोद में ।
मेरी हर थकान-हर फिक्र मिट जाती है , तेरी गोद में ,
बड़ी ही सुकून से भरपूर निंद्रा आती है , तेरी गोद में ।
बड़ा भाग्यशाली हूँ जो यह सुख पाता हूँ , तेरी गोद में ,
अद्भुत और अलौकिक “आनंद” पाता हूँ, तेरी गोद में ।
कान्हां ने जो सुख पाया होगा, यशोदा की गोद में ,
वैसा ही सुख महसूस कर पाता हूँ मैं , तेरी गोद में ।
भाग्यशाली कौशल्या का , आँचल पाया श्री राम ने ,
वैसी ही आँचल की छाया देखता हूँ मैं , तेरी गोद में ।
देवताएं भी तरसते हैं , मातृत्व का सुख पाने के लिए ,
नसीब की बलहारी, मानकर सो जाता हूँ तेरी गोद में ।
हर जन्म तेरी ही कुख मिले मुझे , करता हूँ प्रार्थना मैं ,
जन्म लेके तेरे हाथों पलना चाहता हूँ मैं , तेरी गोद में ।
- गोविन्द रीझवाणी ” आनंद “
- सूरत गुजरात
