पति की मौत के बाद जिद में गांव लौटीं ‘क्वीन ऑफ सस्टेनेबिलिटी’, 1.5 लाख युवाओं को दी ट्रेनिंग; उनके ‘कामधेनु’ घर से 50 घरों में जलती है बिजली

नई दिल्ली: जनक पाल्टा मैकगिलिगन की जिंदगी बेहद अनोखी और प्रेरणादायक है। उन्होंने प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर जीने को अपना मिशन बना लिया है। अब सत्तर के दशक के मध्य-उत्तरार्ध में पहुंच चुकीं जनक इंदौर के पास सनावादिया गांव में अपने जीरो-वेस्ट सस्टेनेबल घर में रहती हैं। यह घर रिन्यूएबल एनर्जी, ऑर्गेनिक खेती, रीसाइक्लिंग और कम्पोस्टिंग का जीवंत उदाहरण है।

17 साल की उम्र में मौत के मुंह से बाल-बाल बचीं जनक की ओपन-हार्ट सर्जरी हुई थी। इस अनुभव ने उन्हें लोगों और धरती दोनों के लिए बेहतर भविष्य बनाने की प्रेरणा दी। 1992 में ब्राजील के रियो डी जनेरियो में पहले अर्थ समिट में भाग लेने के बाद पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनका संकल्प और मजबूत हो गया। उन्होंने सस्टेनेबल और जिम्मेदार जीवनशैली अपनाने का फैसला किया।

पति की मौत के बाद गांव लौटीं
2011 में पति जिमी मैकगिलिगन की मृत्यु के बाद जनक इंदौर के पास सनावादिया गांव में बस गईं। उन्होंने प्रकृति के साथ बेहतर तालमेल का पुराना वादा पूरा करने का फैसला किया और अपने घर को पूरी तरह सस्टेनेबल बना दिया। अब 75 वर्षीय जनक का घर लगभग आत्मनिर्भर है।

बिना बिजली बिल वाला घर
घर की सबसे खास बात है विंडमिल। यह उनकी जरूरत से कहीं ज्यादा बिजली पैदा करती है। नतीजतन घर पर कोई बिजली बिल नहीं आता। अतिरिक्त बिजली आस-पास के करीब 50 घरों को भी सप्लाई की जाती है।

खुद उगाती हैं खाना
जनक ने घर के आस-पास ऑर्गेनिक गार्डन तैयार किया है। वे सब्जियां, दालें, चावल, गेहूं और मसाले खुद उगाती हैं। उनकी जमीन पर लगभग 160 पेड़ और 13 तरह की फसलें हैं। बाजार पर निर्भरता काफी कम हो गई है।

सोलर कुकिंग और अखबार से ईंधन
खाना पकाने का काम ज्यादातर सोलर कुकर से होता है। धूप न होने पर पुराने अखबारों से बनाई गई ईंधन की ईंटें इस्तेमाल की जाती हैं। किचन का कचरा खाद में बदल जाता है। साबुन, शैम्पू, डिटर्जेंट और जैम जैसी चीजें भी घर पर प्राकृतिक सामग्री से बनाई जाती हैं।

1.5 लाख युवाओं को दी ट्रेनिंग
जनक ‘जिमी मैकगिलिगन सेंटर फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ की संस्थापक और निदेशक हैं। इससे पहले वे ‘बारली डेवलपमेंट इंस्टिट्यूट फॉर रूरल विमेन’ की डायरेक्टर रह चुकी हैं। उनके कार्यक्रमों से 1,000 से ज्यादा गांवों के 1.5 लाख से अधिक युवाओं और 6,000 से ज्यादा ग्रामीण-आदिवासी महिलाओं को सोलर कुकिंग और सस्टेनेबल जीवनशैली की ट्रेनिंग मिल चुकी है। कुछ रिपोर्टों में यह आंकड़ा करीब 1.8 लाख बताया गया है।

इलाके में उनके काम के असर के कारण उन्हें ‘क्वीन ऑफ सस्टेनेबिलिटी’ कहा जाता है। प्यार से लोग उन्हें ‘जनक दीदी’ कहते हैं। वे अपने घर पर छात्रों, किसानों और आगंतुकों का स्वागत करती रहती हैं।

पद्म श्री सम्मान
समाज सेवा और पर्यावरण संरक्षण में उनके योगदान को 2015 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। यह सम्मान नई दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में प्रदान किया गया था।

जनक पाल्टा मैकगिलिगन का जीवन साबित करता है कि छोटी-छोटी सोच-समझकर की गई कोशिशें बड़ी तब्दीली ला सकती हैं। उनका ‘कामधेनु’ घर सिर्फ एक घर नहीं, बल्कि टिकाऊ भविष्य का मॉडल है।

रिपोर्ट :सुरेंद्र कुमार

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