सुप्रीम कोर्ट का सवाल: ड्राई स्टेट गुजरात में 600 से ज्यादा मौतों के बावजूद शराबबंदी कितनी कारगर?

गुजरात में दशकों से लागू शराबबंदी को लेकर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने एक बार फिर इस नीति की प्रभावशीलता पर बहस छेड़ दी है। 18 सितंबर 2026 को एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जबरन शराबबंदी शराब की समस्या का अपने आप समाधान नहीं है। अदालत ने गुजरात का उदाहरण देते हुए कहा कि राज्य में लंबे समय से सख्त शराबबंदी लागू होने के बावजूद जहरीली शराब से होने वाली मौतों का सिलसिला पूरी तरह नहीं रुका।

कोर्ट के मुताबिक शराब पर पूरी तरह रोक लगाने से कई बार शराब का कारोबार भूमिगत हो जाता है और इससे अनियमित तथा जहरीली शराब के फैलने का खतरा बढ़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स, 1972 के नियम 18A और 18B को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आई। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इन नियमों की संवैधानिक वैधता पर फैसला सुनाया। अदालत ने दोनों नियमों को असंवैधानिक और मनमाना ठहराते हुए रद्द कर दिया। इन नियमों के तहत मेथनॉल की खरीद और उसके इस्तेमाल पर कुछ विशेष नियंत्रण लगाए गए थे। गैर-दवा निर्माताओं को मेथनॉल बेचने से पहले उसमें रंग और कड़वा पदार्थ मिलाना भी अनिवार्य किया गया था।

अदालत ने गुजरात का विशेष रूप से उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि गुजरात एक ऐसा राज्य है जहां 1960 में राज्य के गठन के बाद से सख्त शराबबंदी नीति लागू रही है। इसके बावजूद राज्य में कम से कम दस बड़े जहरीली शराब कांड सामने आए हैं, जिनमें 600 से अधिक लोगों की मौत का अदालत ने उल्लेख किया। कोर्ट ने इन घटनाओं को इस बात के उदाहरण के रूप में रखा कि केवल शराब पर पूर्ण प्रतिबंध होने से अवैध या जहरीली शराब की समस्या अपने आप समाप्त नहीं हो जाती।

अदालत ने हाल की दो घटनाओं का भी जिक्र किया। इनमें गुजरात के भावनगर और मध्य प्रदेश के सागर में जहरीली शराब से लोगों की मौत हुई थी। फैसले में भावनगर में करीब 13 और सागर में करीब 15 लोगों की मौत का उल्लेख किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह की घटनाएं अधिकारियों के लिए चेतावनी हैं और उन्हें ऐसी त्रासदियों को रोकने के लिए प्रभावी कार्रवाई पर ध्यान देना चाहिए। यानी अदालत का जोर सिर्फ शराबबंदी की मौजूदगी पर नहीं, बल्कि जहरीली शराब के स्रोत, अवैध आपूर्ति और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी था।

कोर्ट ने यह भी कहा कि इतिहास में ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहां पूर्ण शराबबंदी के कारण शराब का कारोबार भूमिगत हो सकता है। जब वैध बाजार और निगरानी व्यवस्था के बाहर शराब की बिक्री बढ़ती है, तो अनियंत्रित और खतरनाक उत्पादों का जोखिम बढ़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के अनुभव को इसी संदर्भ में सामने रखा। अदालत का तर्क था कि यदि अवैध नेटवर्क सक्रिय रहते हैं, तो केवल कानूनी प्रतिबंध उन नेटवर्क को समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता। इसीलिए जहरीली शराब की समस्या से निपटने के लिए अवैध आपूर्ति, निगरानी, भ्रष्टाचार और मेथनॉल के गलत इस्तेमाल जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देना जरूरी है।

इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि 1991 की मुंबई की एक जहरीली शराब त्रासदी से जुड़ी है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, उस समय करीब 250 लोगों ने एक बार से खरीदी गई नकली शराब का सेवन किया था और उनमें से लगभग 93 लोगों की मौत हो गई थी। बाद की जांच में सामने आया कि शराब में मेथनॉल मौजूद था। इस घटना के बाद महाराष्ट्र सरकार ने जहरीली शराब की घटनाओं के कारणों और उन्हें रोकने के उपायों पर विचार करने के लिए एक समिति गठित की। समिति की सिफारिशों के बाद आगे चलकर मेथनॉल से जुड़े नियमों में बदलाव किए गए।

इसी पृष्ठभूमि में 2011 में महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स में नियम 18A और 18B जोड़े गए। नियम 18A के तहत मेथनॉल बेचने वाले लाइसेंसधारी को खरीददार के लाइसेंस और मेथनॉल के इस्तेमाल की जानकारी की जांच करनी होती थी। साथ ही दवा निर्माण के अलावा अन्य उपयोग के लिए मेथनॉल बेचने से पहले उसमें निर्धारित मात्रा में रंग और कड़वा पदार्थ मिलाना जरूरी था। नियम 18B के तहत वैध लाइसेंस के बिना रखे गए मेथनॉल को जब्त करने का प्रावधान था। इन नियमों को लेकर कई उद्योगों ने अदालत का रुख किया और कहा कि इनका उनके कारोबार पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को शराबबंदी नीति पर व्यापक संवैधानिक फैसला मानने के बजाय फैसले के संदर्भ में समझना जरूरी है।

रिपोर्टं : सुरेंद्र कुमार

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