भोपाल/छतरपुर, 24 अप्रैल 2026: मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिलों में केन-बेतवा नदी लिंक परियोजना के खिलाफ आदिवासी समुदाय ने अनोखा और दर्द भरा विरोध प्रदर्शन किया। सैकड़ों आदिवासी महिलाएं और पुरुष प्रतीकात्मक चिताओं पर जिंदा लेटकर सरकार से अपनी जमीन, जंगल और आजीविका बचाने की अपील कर रहे हैं। उनका कहना है कि परियोजना से विस्थापन उनकी मौत से कम नहीं होगा।

8 अप्रैल 2026 को मुख्य रूप से आदिवासी महिलाओं ने ‘चिता आंदोलन’ (Chita Andolan) शुरू किया। प्रदर्शनकारियों ने जल सत्याग्रह, मिट्टी सत्याग्रह, आकाश सत्याग्रह और चूल्हा बंद जैसे रूपों में भी विरोध जताया। आंदोलन लगभग 12 दिन चला, जिसमें कई महिलाओं और बुजुर्गों की तबीयत बिगड़ गई। 16 अप्रैल को जिला प्रशासन के आश्वासन (नई सर्वे, उचित मुआवजा और पुनर्वास की समीक्षा) पर आंदोलन स्थगित कर दिया गया।
आंदोलन क्यों?
केन-बेतवा लिंक परियोजना के तहत दौधन बांध और अन्य संरचनाएं बन रही हैं, जिससे बुंदेलखंड में सिंचाई और पीने के पानी की सुविधा बढ़ेगी। लेकिन प्रभावित क्षेत्र में 24 गांव डूब में आ रहे हैं। आदिवासियों का आरोप है कि मुआवजा अपर्याप्त है, भूमि के बदले भूमि नहीं दी जा रही और पुनर्वास की प्रक्रिया में अनियमितताएं हैं। परियोजना पन्ना टाइगर रिजर्व के हिस्से को भी प्रभावित कर रही है। प्रदर्शनकारियों का नारा है — “न्याय दो या मौत दो”।
देश के अन्य हिस्सों में भी असंतोष
- मणिपुर: मई 2023 से चली आ रही जातीय हिंसा अब भी थम नहीं पाई। अप्रैल 2026 में भी बम विस्फोट, हत्याएं और विरोध प्रदर्शन हुए। हजारों लोग विस्थापित हैं, सैकड़ों मौतें हो चुकी हैं। शांति बहाली के प्रयास जारी हैं, लेकिन गहरी सामुदायिक खाई बनी हुई है।
- गुजरात: विकास के मॉडल वाले राज्य में एलपीजी (रसोई गैस) की भारी कमी से सूरत और मोरबी जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में मजदूर पलायन कर रहे हैं। ईरान संबंधी वैश्विक संकट से गैस आपूर्ति प्रभावित हुई है। हजारों मजदूर रेलवे स्टेशनों पर भीड़ लगाकर गांव लौट रहे हैं। फैक्टरियां बंद हो रही हैं, मजदूरों का कहना है कि खाना पकाने और काम दोनों में दिक्कत हो रही है।
- ओडिशा (रायगड़ा): सिजिमाली क्षेत्र में वेदांता की बॉक्साइट खनन परियोजना के लिए सड़क निर्माण का विरोध तेज है। 7 अप्रैल 2026 को आदिवासियों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प हुई, जिसमें कई लोग घायल हुए। आदिवासी वन अधिकार कानून (FRA), ग्राम सभा सहमति और विस्थापन के डर से परेशान हैं।
सवाल उठ रहे हैं
ये घटनाएं अलग-अलग हैं, लेकिन एक पैटर्न दिखाती हैं — बड़े विकास कार्यों में स्थानीय समुदायों (खासकर आदिवासी) की चिंताओं को पर्याप्त ध्यान नहीं मिल पाता। विकास जरूरी है, लेकिन वह तभी सार्थक होता है जब प्रभावित लोगों को उचित मुआवजा, सम्मानजनक पुनर्वास और आजीविका सुरक्षा मिले।
मुख्यधारा की मीडिया में इन जमीनी मुद्दों को कभी-कभी कम जगह मिलती है, जबकि अन्य घटनाएं ज्यादा चर्चित रहती हैं। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन जब लोग अपनी जान दांव पर लगाकर आवाज उठाने को मजबूर हों, तो संवाद और समाधान की कमी साफ दिखती है।
सरकार और प्रशासन को इन मुद्दों पर पारदर्शी तरीके से बातचीत कर ठोस कदम उठाने की जरूरत है। प्रभावित परिवारों को कानूनी प्रक्रियाओं (PESA, FRA आदि) का पूरा लाभ मिले, यही उम्मीद की जा रही है।
रिपोर्ट :सुरेंद्र कुमार

