नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की पुलिस को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि वह कानून के दायरे में रहकर काम करे और अपनी ताकत का दुरुपयोग न करे। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने यह टिप्पणी हरियाणा पुलिस द्वारा एक व्यक्ति की नियम-विरुद्ध गिरफ्तारी और हिरासत में कथित मारपीट के मामले की सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने इस मामले में हरियाणा के डीजीपी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश भी दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई कि ‘डी के बसु बनाम पश्चिम बंगाल सरकार’ (1996) और ‘अर्णेश कुमार बनाम बिहार सरकार’ (2014) जैसे ऐतिहासिक फैसलों में गिरफ्तारी और हिरासत के नियम स्पष्ट किए गए हैं, लेकिन पुलिस इनका उल्लंघन कर रही है। ‘डी के बसु’ फैसले में गिरफ्तारी के दौरान नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और हिरासत में यातना पर रोक की बात कही गई थी, जबकि ‘अर्णेश कुमार’ फैसले में निर्देश दिया गया था कि 7 साल से कम सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी से पहले नोटिस दी जाए और जरूरत पड़ने पर ही गिरफ्तारी हो।
कोर्ट ने ‘सोमनाथ बनाम महाराष्ट्र सरकार’ (2023) मामले का भी हवाला दिया, जिसमें पुलिस ने एक आरोपी को जूतों की माला पहनाकर सड़क पर घुमाया था। इस तरह की घटनाओं पर कड़ा रुख अपनाते हुए कोर्ट ने सभी राज्यों के डीजीपी को अपने अधिकारियों को नियमों का पालन करने के लिए जागरूक करने का निर्देश दिया। साथ ही, कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री को आदेश दिया कि इस फैसले और संबंधित पुराने फैसलों की प्रतियां सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस प्रमुखों को भेजी जाएं।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि भविष्य में नियमों का उल्लंघन करने वाले पुलिस अधिकारियों को दंडित किया जाएगा। कानून विशेषज्ञों ने इस फैसले को पुलिस सुधार और नागरिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है।
रिपोर्ट : सुरेंद्र कुमार
